ईश्वर कभी आपको भारत में अल्पसंख्यक बनाए तो जैनों जैसा बनिए

BY- AMIT CHATURVEDI

दस दिवसीय गणेशोत्सव के साथ साथ आजकल पर्यूशण पर्व भी चल रहे हैं। दस दिन चलने वाले इस पर्व को दशलक्षण पर्व भी कहा जाता है। जैन धर्मावलम्बीयों के साल के सबसे पवित्र दिन होते हैं। ये दस दिन जिनमें जैन धर्म को मानने वाले नवरात्रों की तरह व्रत और पूजा पाठ करते हैं।

हमारे बचपन से काफ़ी जैन मित्र रहे हैं। इसीलिए इस धर्म को थोड़ा ज़्यादा क़रीब से जानता हूँ मैं। बेहद साफ़ सफ़ाई पसंद और मेहनत करके सफलता पाने में विश्वास करने वाली कम्यूनिटी है जैन कम्यूनिटी।

2011 की जनगणना के अनुसार 121 करोड़ की जनसंख्या में जैनों की संख्या सिर्फ़ 44 लाख है, यानि कुल जनसंख्या का सिर्फ़ 0.4%…इस हिसाब से सबसे अल्पसंख्यक जैन ही हुए देश में, लेकिन जैनों ने आज तक देश में अल्पसंख्यक होने का रोना नहीं रोया।

आपको जानकर आश्चर्य नहीं होगा कि सिर्फ़ 0.4% हिस्सेदारी रखने वाले जैन लोग इस देश की अर्थव्यवस्था में 25% योगदान देते हैं, गुजरात से नागालैंड तक और श्रीनगर से श्रीपेरम्बदूर तक आपको जैन बंधु व्यापार करते मिल जाएँगे, जहाँ भी रहेंगे समाज में घुल मिल जाएँगे लेकिन कभी गुट बनाकर सरकार या व्यवस्था के ख़िलाफ़ किसी प्रकार का रोना धोना करते कभी कोई जैन नहीं मिलेगा।

सरकार को मिलने वाले इंकम टैक्स में जैनों का योगदान 25% है, देश भर में चलने वाली गौशलाओं में से आधी से ज़्यादा सिर्फ़ जैन बंधु चलाते हैं। जैन मंदिरों के बाहर कभी कोई भिखारी नज़र नहीं आता क्यूँकि जैन लोग कभी भीख नहीं देते लेकिन अभी कोरोना काल में सबसे ज़्यादा चैरिटी करने में जैन सबसे आगे थे।

देश के पहले चक्रवर्ती सम्राट चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त मौर्य ने जैन धर्म अपना लिया था, लेकिन अपने राज्य के किसी भी व्यक्ति यहाँ तक कि अपने परिवार को जैन बनने का दबाव नहीं डाला। चंद्रगुप्त मौर्य कर्नाटक में श्रवणबेलगोला में जाकर रहने लगे थे। जैन कभी धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते, लेकिन कभी किसी को जैन मंदिरों या जैन गुरुओं से मिलने या उनकी पूजा करने से नहीं रोकते, आचार्य विद्यासागर के जितने जैन शिष्य हैं हिंदू भी उनसे कम नहीं होंगे।

इसीलिए, ईश्वर कभी आपको भारत में अल्पसंख्यक बनाए तो जैनों जैसा बनिए। तमाम जैन धर्मावलम्बी जनों को पर्यूशन पर्व की बधाइयाँ, शुभकामनाएँ।

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